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Showing posts from April, 2018

एक स्मृति का दुख (Part-2)

"हैलो?" उस ओर से कोई आवाज नहीं आई. किआ ने दोबारा कहा -"हैलो?" उस ओर से कुछ जो़र से गिरने की आवाज़ आई और फोन कट गया. किआ ने फोन करने का प्रयास किया मगर अब वो नंबर बंद हो चुका था. किआ ने अपना बैग उठाया और घर के लिए जाने लगी. रास्ते में उसने उस फोन काॅल के बारे में सोचा. क्या वो कोई पहचान का होगा? या फिर गलती से किसी ने? मगर फोन क्यूँ नहीं लग रहा होगा? क्या फोन गिर कर बंद हुआ होगा? या किसी ने जानबुझ कर? इन्हीं सवालों के साथ बातचीत करते-करते किआ घर पहुँच गई थी. सुबह स्याह थी. रात से भी अधिक. किआ कल की बची पैकिंग के लिए सामान समेटने लगी. उसे इस जगह पर रहते एक साल भी नहीं हुआ था मगर उसका दिल आ गया था इस शहर पर. उसने सोचा की काश वो भाग सकती यहां से दूर कहीं. जहाँ सुकून होता. जहाँ उसकी परेशानीयां नहीं होती. दूर-दूर तक भी नहीं. लेकिन हम जगहों से भाग सकते हैं,  हालातों से नहीं. यहां से कहीं चले भी जाया जाए तो फिर नई जगह की नई चुनौतियां हमारा इंतज़ार कर रही होती है. हम घिरे रहते हैं इन्हीं चुनौतियों के घेरे में. जगह बदलने से इस घेरे का दायरा बढ़ जाता है मगर इस घेरे से ब...

पांचवी बात से पहले

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किसी किताब के बीच छुपा रखे थे दो आंसू उसने. और छुपा रखी थी बहुत सी बेचैनी अपने भीतर. ***** हम उम्र भर घुमते रहते हैं किसी उदासी भरे मर्तबान के आस-पास चींटी जैसे. -"सुख कहा है?" -"पता नहीं." -"क्या कोई मर्तबान होगा खुशी का? क्या हम कभी उसमें खो सकते हैं? कि वही घुमते हुए गुज़र जाए उम्र सारी?" -'' तुम्हारी इन बातों को सुन कर दुख होने लगता है मुझे......  सुनो, चलो कहीं घुम कर आते हैं.'' -''चलो.'' ***** उसने नायक से विदा लेते हुए कहा - "उस दिन का एक टुकडा़ रखा है संभाल कर मैंने. खुशी. बाकि रखे ही थे बेहिसाब दुख. जाने कब से. " ***** हम किसी बात में उलझ कर खोने लगते हैं खुद को. आहिस्ता-आहिस्ता. काश मैंने सोची होती यह बात तुम्हारी किसी भी बात को सोचने से पहले! 

एक स्मृति का दुख

थोडी़ सी बेचैनी में से चार टुकडे़ रख दिए है किनारे उसने. एक हाथ में कोल्ड कॉफी लिए और दूसरे हाथ में  एक पुराना चाबी का छल्ला लगातार चारो तरफ उंगलियों से घुमाते हुए उसने सोचा कि जाने क्या बात रही होगी उसकी उदासी के पीछे. उसके मुँह पर निराशा घर कर चुकी थी मगर वो सड़क इतनी सुनसान थी कि कोई उसकी उस निराशा को पढ़ नहीं सकता था. किआ कई देर तक ऐसे ही बैठी रही. मौन. कोल्ड कॉफी खत्म करने के बाद उसने अपने बैग से फोन निकाल कर उसे थोडी़ देर तक निहारा फिर उसे दोबारा बैग में रख दिया. एक गहरी सास ले कर उसने अपने हाथ में पकड़े छल्ले को सामने बह रहे दरिया में फेंक दिया. बारिश की गहरी स्याह शाम धीरे-धीरे उसके चारों ओर उतर आई थी. उसे देख कर लग रहा था की वह एक मृत शरीर बन  चुकी है. जिस पर हज़ार विलापो का, मन्नतों का या फिर चाहनाओं का कोई असर नहीं हो पाता. जो बस वैसा ही रह जाए. स्थिर. जिसमे कोई चेतना बची न हो. किआ वही लगी बेंच पर दो घंटों से बैठी हुई थी. बारिश की हल्की फुहारे गिरने लगी थी और थोडी़ देर बाद उसने लगभग घबराते हुए आसपास देखा जैसे वो अब तक किसी गहरी नींद में थी. इसी घबराहट में उसन...