एक स्मृति का दुख (Part-2)
"हैलो?" उस ओर से कोई आवाज नहीं आई. किआ ने दोबारा कहा -"हैलो?" उस ओर से कुछ जो़र से गिरने की आवाज़ आई और फोन कट गया. किआ ने फोन करने का प्रयास किया मगर अब वो नंबर बंद हो चुका था. किआ ने अपना बैग उठाया और घर के लिए जाने लगी. रास्ते में उसने उस फोन काॅल के बारे में सोचा. क्या वो कोई पहचान का होगा? या फिर गलती से किसी ने? मगर फोन क्यूँ नहीं लग रहा होगा? क्या फोन गिर कर बंद हुआ होगा? या किसी ने जानबुझ कर? इन्हीं सवालों के साथ बातचीत करते-करते किआ घर पहुँच गई थी. सुबह स्याह थी. रात से भी अधिक. किआ कल की बची पैकिंग के लिए सामान समेटने लगी. उसे इस जगह पर रहते एक साल भी नहीं हुआ था मगर उसका दिल आ गया था इस शहर पर. उसने सोचा की काश वो भाग सकती यहां से दूर कहीं. जहाँ सुकून होता. जहाँ उसकी परेशानीयां नहीं होती. दूर-दूर तक भी नहीं. लेकिन हम जगहों से भाग सकते हैं, हालातों से नहीं. यहां से कहीं चले भी जाया जाए तो फिर नई जगह की नई चुनौतियां हमारा इंतज़ार कर रही होती है. हम घिरे रहते हैं इन्हीं चुनौतियों के घेरे में. जगह बदलने से इस घेरे का दायरा बढ़ जाता है मगर इस घेरे से ब...