एक स्मृति का दुख
थोडी़ सी बेचैनी में से चार टुकडे़ रख दिए है किनारे उसने. एक हाथ में कोल्ड कॉफी लिए और दूसरे हाथ में एक पुराना चाबी का छल्ला लगातार चारो तरफ उंगलियों से घुमाते हुए उसने सोचा कि जाने क्या बात रही होगी उसकी उदासी के पीछे.
उसके मुँह पर निराशा घर कर चुकी थी मगर वो सड़क इतनी सुनसान थी कि कोई उसकी उस निराशा को पढ़ नहीं सकता था. किआ कई देर तक ऐसे ही बैठी रही. मौन. कोल्ड कॉफी खत्म करने के बाद उसने अपने बैग से फोन निकाल कर उसे थोडी़ देर तक निहारा फिर उसे दोबारा बैग में रख दिया. एक गहरी सास ले कर उसने अपने हाथ में पकड़े छल्ले को सामने बह रहे दरिया में फेंक दिया.
बारिश की गहरी स्याह शाम धीरे-धीरे उसके चारों ओर उतर आई थी. उसे देख कर लग रहा था की वह एक मृत शरीर बन चुकी है. जिस पर हज़ार विलापो का, मन्नतों का या फिर चाहनाओं का कोई असर नहीं हो पाता. जो बस वैसा ही रह जाए. स्थिर. जिसमे कोई चेतना बची न हो.
किआ वही लगी बेंच पर दो घंटों से बैठी हुई थी. बारिश की हल्की फुहारे गिरने लगी थी और थोडी़ देर बाद उसने लगभग घबराते हुए आसपास देखा जैसे वो अब तक किसी गहरी नींद में थी. इसी घबराहट में उसने फोन दोबारा बैग से निकाला और स्क्रीन पर अचानक कोई नंबर चमकने लगा.
****
अगला भाग जल्द ही! 😊
उसके मुँह पर निराशा घर कर चुकी थी मगर वो सड़क इतनी सुनसान थी कि कोई उसकी उस निराशा को पढ़ नहीं सकता था. किआ कई देर तक ऐसे ही बैठी रही. मौन. कोल्ड कॉफी खत्म करने के बाद उसने अपने बैग से फोन निकाल कर उसे थोडी़ देर तक निहारा फिर उसे दोबारा बैग में रख दिया. एक गहरी सास ले कर उसने अपने हाथ में पकड़े छल्ले को सामने बह रहे दरिया में फेंक दिया.
बारिश की गहरी स्याह शाम धीरे-धीरे उसके चारों ओर उतर आई थी. उसे देख कर लग रहा था की वह एक मृत शरीर बन चुकी है. जिस पर हज़ार विलापो का, मन्नतों का या फिर चाहनाओं का कोई असर नहीं हो पाता. जो बस वैसा ही रह जाए. स्थिर. जिसमे कोई चेतना बची न हो.
किआ वही लगी बेंच पर दो घंटों से बैठी हुई थी. बारिश की हल्की फुहारे गिरने लगी थी और थोडी़ देर बाद उसने लगभग घबराते हुए आसपास देखा जैसे वो अब तक किसी गहरी नींद में थी. इसी घबराहट में उसने फोन दोबारा बैग से निकाला और स्क्रीन पर अचानक कोई नंबर चमकने लगा.
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