पहेली
बेतहाशा कोशिशों के बाद भी, तुम्हें जानने में असफल होना, अक्सर मुझे खुद से नाराज़ कर देता है. तुम कोई अनसुलझी पहेली हो, मैं हुँ नौसिखिया कोई. . . . . . . . पहेलियों की दुनिया के सफर से पहले, नहीं घबराया उसका मन आम सफर की तरह. तुम्हारे संग रहने का खयाल भर भी खुशी है. . . . . . . . हाल-ए-दिल की कचहरी में, उसे तलब किया है गुनहगार बना कर, दिल इससे अच्छा और इससे बुरा काम और क्या करता. . . . . . . . . . . . उसका सुकून खाना था, मेरा सुकून वो. . . . . इन दिनों बातें पहेलियों से शुरु होकर उस पर खत्म होती है.