पहेली

बेतहाशा कोशिशों के बाद भी,
तुम्हें जानने में असफल होना,
अक्सर मुझे खुद से नाराज़ कर देता है.

तुम कोई अनसुलझी पहेली हो,
मैं हुँ नौसिखिया कोई.
. . . . . . .
पहेलियों की दुनिया के सफर से पहले,
नहीं घबराया उसका मन आम सफर की तरह.

तुम्हारे संग रहने का खयाल भर भी खुशी है.
. . . . . . .
हाल-ए-दिल की कचहरी में,
उसे तलब किया है गुनहगार बना कर,

दिल इससे अच्छा और इससे बुरा काम और क्या करता.
. . . . . . . . . . .
उसका सुकून खाना था,
मेरा सुकून वो.
. . . .
इन दिनों बातें पहेलियों से शुरु होकर उस पर खत्म होती है.



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