एक महल था ताश का, एक ख्वाब था कांच का, दोनो बिखरे बैठे है, और तीसरी मैं बैठी हूँ चुप. ********** पैकिंग करते वक़्त मैनें ट्रॉली बैग की सबसे नीचे की चैन में रख ली है कुछ खुशियां छुपा कर. मगर उदासी अभी भी छलक जाती है आँखों से. *********** देर सवेर का एक ख्वाब था, तुम्हारा धुंधलाता हुआ चेहरा, तुम्हारी मिटती हुई आवाज़, और फिर स्याह अंधेरा. हर ओर. मै अक्सर ऐसे ही घबरा कर उठ जाती हूँ. *********** हल्के कत्थई रंग से सज चुकी है शाम, उसकी उदासी का रंग गहरा कर हो गया है स्याह, और फिरोजी रंग की बात निरर्थक है इस बातचीत में, हालांकि उसकी मुस्कान का रंग गुलाबी था. ********** कई दफा मन होता है, तुम से बात करने का, कि कहूँ तुम्हें, जानां! तुम्हारे पास शायद भुल आई हूँ मै. खुदको. **********
बेतहाशा कोशिशों के बाद भी, तुम्हें जानने में असफल होना, अक्सर मुझे खुद से नाराज़ कर देता है. तुम कोई अनसुलझी पहेली हो, मैं हुँ नौसिखिया कोई. . . . . . . . पहेलियों की दुनिया के सफर से पहले, नहीं घबराया उसका मन आम सफर की तरह. तुम्हारे संग रहने का खयाल भर भी खुशी है. . . . . . . . हाल-ए-दिल की कचहरी में, उसे तलब किया है गुनहगार बना कर, दिल इससे अच्छा और इससे बुरा काम और क्या करता. . . . . . . . . . . . उसका सुकून खाना था, मेरा सुकून वो. . . . . इन दिनों बातें पहेलियों से शुरु होकर उस पर खत्म होती है.
"तुमने तिलिस्मी दुनिया देखी है?" हर ओर बिखरी होती है वहाँ चाँदनी, कितना तो शोर होता है, निरंतर फूटता शोर, हज़ारों चुप्पीयो के बीच से कही, मन किसी अव्वल दर्जे के जज सा, बैठ जाता है सारी फरियादे सुनने, मन ही पहुंचता है फिर फरियादे लेकर. यह वसंत विरह क्या है? प्रेम की अदालतों में दर्ज है करोड़ों से भी ज्यादा अर्जी़याँ, दुनिया के पहले छोर से आखरी छोर तक के प्रेमियों की, हर दूसरी अर्जी़ में अंकित है बस एक ही शिकायत, "तुम्हारे खत के आख़िर में लिखें सारे वादे झूठे थे जानां" कि वो जो अगली मुलाकात होनी थी, वो कब होगी? होगी या की नहीं? या की वसंत विरह सा गुज़रेगा? या की वसंत वह है जब तुम आओगे.
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