रुमानी खयाल

विरह का मौसम अंत की ओर है
वसंत की पहली आहट हुई है अभी
और सब ओर की जाने लगी
अपने हमदर्द से मिलने की मन्नतें,
गली की ओर खुलती, इक मुद्दत
से बंद खिड़की को खोला गया,
और गली के आखरी छोर के पेड़
के नीचे की जगह खंगाली गई,
लिखी गई कुछ एक नज्में,
कुछ याद किया गया उन्हें,
इंद्रधनुष के रंगों से सजाई गई
सब दुआएं आसमान पर,
तितलियों सी ख्वाहिशें
उड़ने लगी चारों ओर,
रंग-बिरंगी लिबास में.

बरसती फुहारों के बीच, मेरे मन के भीतर
चलने लगती है तुम्हारे संग बीते लम्हों की झलक.
हर मुमकिन झलक.

तुम न हो तो बस यह कुछ रुमानी खयाल ही हैं,
जो तुम्हारे न होते हुए भी, ज़र्रे-ज़र्रे में,
तुम्हारे होने का एहसास करवाते हैं.
हर आस, हर चाह, हर नज़्म मे बस-तुम

ओ फरेबी! तुम्हारा शुक्रिया
तुम जहाँ भी रहो, खुश रहो,
जियो फकत हकीकत में,
की रुमानी खयालों की संगत
हर दम अच्छी नहीं होती.






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