डायरी का पन्ना

नए दुख की धूसर परत
आ बैठी है पुराने दुख पर,

इसके अलावा नहीं होता कुछ नया, दुख में.
. . .
सुकून की तलाश में घुमते हुए,
जा बैठना किसी सड़क किनारे,
चाँद की रोशनी में मुस्कुराना,
और
रोना कभी. बहुत सारा.

किसी साल के हर दूसरे-तीसरे दिन का चला आ रहा क्रम.
. . . .



किसी प्रोफाइल में घुमते हुए
एक तस्वीर दिखी है उसकी.

सुकून.
. . . . .
उसमे और उसकी तस्वीर में कोई फर्क नहीं है,
सिवा इसके की वो अब अक्सर नाराज़ रहता है.

. . .
रात की ट्रेन पकड़ने से पहले
उसने कहा नहीं कुछ भी,
मगर लगा की उसने कहा हो

जाने कैसे रहोगी अब अकेले तुम.






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