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Showing posts from 2019

बचाव

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मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि तुम क्या सोचा करते हो उदास शामों में, मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि हम जब मिले थे आखरी बार तब तुम रुक सकते थे थोड़ी देर और, मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि तुम जिस लड़की से मिले थे कल वो ख़ूबसूरत है, मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि क्या आज तुम दिख पाओगे फ़िर से, मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि तुम कितने प्यारे हो और मैं . . . मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि क्या तुम सोचते हो कभी, मेरे बारे में . मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि तुम्हें बचाने के लिए मुझे बचना होगा खुद को .

ऐतबार की आदत

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एक रोज़ एक मशविरा दिया था मैने कि बात तो चला कर देखते हैं, लेकिन किसी खुराफाती ने सोचा क्यूँ ना बात को बढ़ा कर देखते हैं. एक दौर था कि लोग कहते थे ज़ख्म पर मरहम लगा कर देखते है, अब के तो सब कहते हैं कि चलो ज़ख्म से मरहम हटा कर देखते हैं. उसके ज़िक्र से जो आने लगी है अब रौनक-ए-बहार मेरे चेहरे पर , अहबाब भी अब कहने लगे हैं कि ज़रा उसे तो ये बता कर देखते हैं. मुझे ऐतबार की आदत है और मैं इसलिए धोके खाती रहती हूँ अक्सर, और तुम सोचते हो कि बस कुछ दिन इससे इश्क़ जता कर  देखते हैं. मेरे माज़ी से कोई क़िस्सा निकल आता है हर रात यू तो बसर में मेरी, एक दीवाना है जो कहता है कि इससे कोई गज़ल सजा कर  देखते हैं. अहबाब - दोस्त माज़ी - अतीत बसर - नज़र

रफ़ाकत और इत्मिनान

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बिछे पड़े हैं यूं तो शहर में लाखों मकान दूर तक, दिखते नहीं हैं मगर कहीं भी तेरे निशान दूर तक. हाल ऐसा है कि सिमटी बेठी है उदासी भी साथ , वक्त ऐसा है कि शजर दिखते हैं परेशान दूर तक. किसी की नज़र-ए-करम के इंतज़ार में हैं लेकिन, हैं वैसे तो उनके भी कई सारे हमराज़ दूर तक. उसकी रफ़ाकत से रौशन ज़िंदगी और इत्मिनान, इस जानिब तो नहीं लगते हैं ऐसे आसार दूर तक. किसी पहाड़ में आकर इस कदर फंस गयीं हुँ कि, सुनाई देती है मुझे बस मेरी ही आवाज़ दूर तक.

पहेली

बेतहाशा कोशिशों के बाद भी, तुम्हें जानने में असफल होना, अक्सर मुझे खुद से नाराज़ कर देता है. तुम कोई अनसुलझी पहेली हो, मैं हुँ नौसिखिया कोई. . . . . . . . पहेलियों की दुनिया के सफर से पहले, नहीं घबराया उसका मन आम सफर की तरह. तुम्हारे संग रहने का खयाल भर भी खुशी है. . . . . . . . हाल-ए-दिल की कचहरी में, उसे तलब किया है गुनहगार बना कर, दिल इससे अच्छा और इससे बुरा काम और क्या करता. . . . . . . . . . . . उसका सुकून खाना था, मेरा सुकून वो. . . . . इन दिनों बातें पहेलियों से शुरु होकर उस पर खत्म होती है.