ऐतबार की आदत



एक रोज़ एक मशविरा दिया था मैने कि बात तो चला कर देखते हैं,
लेकिन किसी खुराफाती ने सोचा क्यूँ ना बात को बढ़ा कर देखते हैं.

एक दौर था कि लोग कहते थे ज़ख्म पर मरहम लगा कर देखते है,
अब के तो सब कहते हैं कि चलो ज़ख्म से मरहम हटा कर देखते हैं.

उसके ज़िक्र से जो आने लगी है अब रौनक-ए-बहार मेरे चेहरे पर ,
अहबाब भी अब कहने लगे हैं कि ज़रा उसे तो ये बता कर देखते हैं.

मुझे ऐतबार की आदत है और मैं इसलिए धोके खाती रहती हूँ अक्सर,
और तुम सोचते हो कि बस कुछ दिन इससे इश्क़ जता कर  देखते हैं.

मेरे माज़ी से कोई क़िस्सा निकल आता है हर रात यू तो बसर में मेरी,
एक दीवाना है जो कहता है कि इससे कोई गज़ल सजा कर  देखते हैं.

अहबाब - दोस्त
माज़ी - अतीत
बसर - नज़र










Comments

  1. Very well written ����������

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  2. Ishq me deewane huee insaan ke sachi dasta ke varnan kiya gaya he upar likhe dhuke insaan ke sabdoo me.

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    1. Ishqnama likhenge to deewane kahe jaayenge,
      Dukh me jo dube wo deewane kahe jaayenge.

      Jaaye to jaaye kaha? Kare to kare kya? 😂

      Delete

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