रफ़ाकत और इत्मिनान
बिछे पड़े हैं यूं तो शहर में लाखों मकान दूर तक,
दिखते नहीं हैं मगर कहीं भी तेरे निशान दूर तक.
हाल ऐसा है कि सिमटी बेठी है उदासी भी साथ ,
वक्त ऐसा है कि शजर दिखते हैं परेशान दूर तक.
किसी की नज़र-ए-करम के इंतज़ार में हैं लेकिन,
हैं वैसे तो उनके भी कई सारे हमराज़ दूर तक.
उसकी रफ़ाकत से रौशन ज़िंदगी और इत्मिनान,
इस जानिब तो नहीं लगते हैं ऐसे आसार दूर तक.
किसी पहाड़ में आकर इस कदर फंस गयीं हुँ कि,
सुनाई देती है मुझे बस मेरी ही आवाज़ दूर तक.

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