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Showing posts from 2018

Draft

It has been so long since I wrote anything. It has been so long since I felt the kind of love I used to feel. September 20 One day I felt so empty that I wanted to die. October 5 It was few days back when I perceived I like to be around you, you know. The other day, I was out for grocery shopping and I bumped into you. It made my day. October 9 I think love changes everything. It makes you mature and immature at the same time. No, I don't miss you. Oh, I do. October 16 I want to ask you out. May be some day. October 31 I want this to work out. I am happy nowadays. You know how hard it is for me to be happy. I am an atheist, but I can pray to god for you, for us. May god bless us. May he never ever separates us. November 10 It has been four days since I saw you. I am feeling bad. November 24 I  love oversized clothes. I want to steal all your hoodies, even if you don't like it. December 1 I lack stability. I will be happy for some reasons and then in ...

शहर दिल्ली

किसी एक सवाल के जवाब के लिए हम अनजाने ही बुनने लगते हैं कई सारे नए सवाल. फिर हम खोजने लगते हैं उन नए सवालों के जवाबों को. इन सवालों के जवाबों में फिर उभर आते हैं इनमें छुपे नए सवाल. जाने हम क्या ढूंढने आए थे इतनी दूर. जाने अब क्या ढूंढना पड़ रहा है. . . . . . . . दिल्ली की सड़कों पर चलती हूं मैं , हलका बस्ता और भारी मन लिए. . . . . . . दिल्ली के रास्ते बहुत लंबे हैं, यहां की रातें जाने किस उजाले से रोशन है, यहां बारिशे बहुत कम होती है, यहां हम घूमते हैं अनचाही मुस्कान लिए, यहां हमारे शहर सा कुछ नहीं है. यहां किसी मोड़ पर चलते हुए, तुम से टकरा जाना नहीं होता. . . . . . . . दिल्ली की धुंध भरी किसी शाम में, एक फिकी मुस्कान के साथ उसने अलाव में हाथ सेकते हुए कहा, "हम शहर बदल सकते हैं, मगर अपने इन हालातों का क्या करेंगे?" . . . . . . . दिल्ली की किसी सड़क पर बैठे हुए, मैं लिख रही हूं दिल्ली के किस्से और कोई नाम है जो स्मृति में है. स्मृति जो मिट जानी चाहिए, उसके हमें मिटा देने से पहले. 

डायरी का पन्ना

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नए दुख की धूसर परत आ बैठी है पुराने दुख पर, इसके अलावा नहीं होता कुछ नया, दुख में. . . . सुकून की तलाश में घुमते हुए, जा बैठना किसी सड़क किनारे, चाँद की रोशनी में मुस्कुराना, और रोना कभी. बहुत सारा. किसी साल के हर दूसरे-तीसरे दिन का चला आ रहा क्रम. . . . . किसी प्रोफाइल में घुमते हुए एक तस्वीर दिखी है उसकी. सुकून. . . . . . उसमे और उसकी तस्वीर में कोई फर्क नहीं है, सिवा इसके की वो अब अक्सर नाराज़ रहता है. . . . रात की ट्रेन पकड़ने से पहले उसने कहा नहीं कुछ भी, मगर लगा की उसने कहा हो जाने कैसे रहोगी अब अकेले तुम.

एक स्मृति का दुख (Part-2)

"हैलो?" उस ओर से कोई आवाज नहीं आई. किआ ने दोबारा कहा -"हैलो?" उस ओर से कुछ जो़र से गिरने की आवाज़ आई और फोन कट गया. किआ ने फोन करने का प्रयास किया मगर अब वो नंबर बंद हो चुका था. किआ ने अपना बैग उठाया और घर के लिए जाने लगी. रास्ते में उसने उस फोन काॅल के बारे में सोचा. क्या वो कोई पहचान का होगा? या फिर गलती से किसी ने? मगर फोन क्यूँ नहीं लग रहा होगा? क्या फोन गिर कर बंद हुआ होगा? या किसी ने जानबुझ कर? इन्हीं सवालों के साथ बातचीत करते-करते किआ घर पहुँच गई थी. सुबह स्याह थी. रात से भी अधिक. किआ कल की बची पैकिंग के लिए सामान समेटने लगी. उसे इस जगह पर रहते एक साल भी नहीं हुआ था मगर उसका दिल आ गया था इस शहर पर. उसने सोचा की काश वो भाग सकती यहां से दूर कहीं. जहाँ सुकून होता. जहाँ उसकी परेशानीयां नहीं होती. दूर-दूर तक भी नहीं. लेकिन हम जगहों से भाग सकते हैं,  हालातों से नहीं. यहां से कहीं चले भी जाया जाए तो फिर नई जगह की नई चुनौतियां हमारा इंतज़ार कर रही होती है. हम घिरे रहते हैं इन्हीं चुनौतियों के घेरे में. जगह बदलने से इस घेरे का दायरा बढ़ जाता है मगर इस घेरे से ब...

पांचवी बात से पहले

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किसी किताब के बीच छुपा रखे थे दो आंसू उसने. और छुपा रखी थी बहुत सी बेचैनी अपने भीतर. ***** हम उम्र भर घुमते रहते हैं किसी उदासी भरे मर्तबान के आस-पास चींटी जैसे. -"सुख कहा है?" -"पता नहीं." -"क्या कोई मर्तबान होगा खुशी का? क्या हम कभी उसमें खो सकते हैं? कि वही घुमते हुए गुज़र जाए उम्र सारी?" -'' तुम्हारी इन बातों को सुन कर दुख होने लगता है मुझे......  सुनो, चलो कहीं घुम कर आते हैं.'' -''चलो.'' ***** उसने नायक से विदा लेते हुए कहा - "उस दिन का एक टुकडा़ रखा है संभाल कर मैंने. खुशी. बाकि रखे ही थे बेहिसाब दुख. जाने कब से. " ***** हम किसी बात में उलझ कर खोने लगते हैं खुद को. आहिस्ता-आहिस्ता. काश मैंने सोची होती यह बात तुम्हारी किसी भी बात को सोचने से पहले! 

एक स्मृति का दुख

थोडी़ सी बेचैनी में से चार टुकडे़ रख दिए है किनारे उसने. एक हाथ में कोल्ड कॉफी लिए और दूसरे हाथ में  एक पुराना चाबी का छल्ला लगातार चारो तरफ उंगलियों से घुमाते हुए उसने सोचा कि जाने क्या बात रही होगी उसकी उदासी के पीछे. उसके मुँह पर निराशा घर कर चुकी थी मगर वो सड़क इतनी सुनसान थी कि कोई उसकी उस निराशा को पढ़ नहीं सकता था. किआ कई देर तक ऐसे ही बैठी रही. मौन. कोल्ड कॉफी खत्म करने के बाद उसने अपने बैग से फोन निकाल कर उसे थोडी़ देर तक निहारा फिर उसे दोबारा बैग में रख दिया. एक गहरी सास ले कर उसने अपने हाथ में पकड़े छल्ले को सामने बह रहे दरिया में फेंक दिया. बारिश की गहरी स्याह शाम धीरे-धीरे उसके चारों ओर उतर आई थी. उसे देख कर लग रहा था की वह एक मृत शरीर बन  चुकी है. जिस पर हज़ार विलापो का, मन्नतों का या फिर चाहनाओं का कोई असर नहीं हो पाता. जो बस वैसा ही रह जाए. स्थिर. जिसमे कोई चेतना बची न हो. किआ वही लगी बेंच पर दो घंटों से बैठी हुई थी. बारिश की हल्की फुहारे गिरने लगी थी और थोडी़ देर बाद उसने लगभग घबराते हुए आसपास देखा जैसे वो अब तक किसी गहरी नींद में थी. इसी घबराहट में उसन...