पांचवी बात से पहले

किसी किताब के बीच छुपा रखे थे दो आंसू उसने.
और छुपा रखी थी बहुत सी बेचैनी अपने भीतर.
*****
हम उम्र भर घुमते रहते हैं किसी उदासी भरे मर्तबान के आस-पास चींटी जैसे.

-"सुख कहा है?"
-"पता नहीं."
-"क्या कोई मर्तबान होगा खुशी का? क्या हम कभी उसमें खो सकते हैं? कि वही घुमते हुए गुज़र जाए उम्र सारी?"
-'' तुम्हारी इन बातों को सुन कर दुख होने लगता है मुझे......  सुनो, चलो कहीं घुम कर आते हैं.''
-''चलो.''
*****
उसने नायक से विदा लेते हुए कहा -
"उस दिन का एक टुकडा़ रखा है संभाल कर मैंने. खुशी.
बाकि रखे ही थे बेहिसाब दुख. जाने कब से. "
*****
हम किसी बात में उलझ कर खोने लगते हैं खुद को. आहिस्ता-आहिस्ता.
काश मैंने सोची होती यह बात तुम्हारी किसी भी बात को सोचने से पहले! 

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