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बचाव

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मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि तुम क्या सोचा करते हो उदास शामों में, मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि हम जब मिले थे आखरी बार तब तुम रुक सकते थे थोड़ी देर और, मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि तुम जिस लड़की से मिले थे कल वो ख़ूबसूरत है, मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि क्या आज तुम दिख पाओगे फ़िर से, मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि तुम कितने प्यारे हो और मैं . . . मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि क्या तुम सोचते हो कभी, मेरे बारे में . मुझे छोड़ देना चाहिए सोचना कि तुम्हें बचाने के लिए मुझे बचना होगा खुद को .

ऐतबार की आदत

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एक रोज़ एक मशविरा दिया था मैने कि बात तो चला कर देखते हैं, लेकिन किसी खुराफाती ने सोचा क्यूँ ना बात को बढ़ा कर देखते हैं. एक दौर था कि लोग कहते थे ज़ख्म पर मरहम लगा कर देखते है, अब के तो सब कहते हैं कि चलो ज़ख्म से मरहम हटा कर देखते हैं. उसके ज़िक्र से जो आने लगी है अब रौनक-ए-बहार मेरे चेहरे पर , अहबाब भी अब कहने लगे हैं कि ज़रा उसे तो ये बता कर देखते हैं. मुझे ऐतबार की आदत है और मैं इसलिए धोके खाती रहती हूँ अक्सर, और तुम सोचते हो कि बस कुछ दिन इससे इश्क़ जता कर  देखते हैं. मेरे माज़ी से कोई क़िस्सा निकल आता है हर रात यू तो बसर में मेरी, एक दीवाना है जो कहता है कि इससे कोई गज़ल सजा कर  देखते हैं. अहबाब - दोस्त माज़ी - अतीत बसर - नज़र

रफ़ाकत और इत्मिनान

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बिछे पड़े हैं यूं तो शहर में लाखों मकान दूर तक, दिखते नहीं हैं मगर कहीं भी तेरे निशान दूर तक. हाल ऐसा है कि सिमटी बेठी है उदासी भी साथ , वक्त ऐसा है कि शजर दिखते हैं परेशान दूर तक. किसी की नज़र-ए-करम के इंतज़ार में हैं लेकिन, हैं वैसे तो उनके भी कई सारे हमराज़ दूर तक. उसकी रफ़ाकत से रौशन ज़िंदगी और इत्मिनान, इस जानिब तो नहीं लगते हैं ऐसे आसार दूर तक. किसी पहाड़ में आकर इस कदर फंस गयीं हुँ कि, सुनाई देती है मुझे बस मेरी ही आवाज़ दूर तक.

पहेली

बेतहाशा कोशिशों के बाद भी, तुम्हें जानने में असफल होना, अक्सर मुझे खुद से नाराज़ कर देता है. तुम कोई अनसुलझी पहेली हो, मैं हुँ नौसिखिया कोई. . . . . . . . पहेलियों की दुनिया के सफर से पहले, नहीं घबराया उसका मन आम सफर की तरह. तुम्हारे संग रहने का खयाल भर भी खुशी है. . . . . . . . हाल-ए-दिल की कचहरी में, उसे तलब किया है गुनहगार बना कर, दिल इससे अच्छा और इससे बुरा काम और क्या करता. . . . . . . . . . . . उसका सुकून खाना था, मेरा सुकून वो. . . . . इन दिनों बातें पहेलियों से शुरु होकर उस पर खत्म होती है.

Draft

It has been so long since I wrote anything. It has been so long since I felt the kind of love I used to feel. September 20 One day I felt so empty that I wanted to die. October 5 It was few days back when I perceived I like to be around you, you know. The other day, I was out for grocery shopping and I bumped into you. It made my day. October 9 I think love changes everything. It makes you mature and immature at the same time. No, I don't miss you. Oh, I do. October 16 I want to ask you out. May be some day. October 31 I want this to work out. I am happy nowadays. You know how hard it is for me to be happy. I am an atheist, but I can pray to god for you, for us. May god bless us. May he never ever separates us. November 10 It has been four days since I saw you. I am feeling bad. November 24 I  love oversized clothes. I want to steal all your hoodies, even if you don't like it. December 1 I lack stability. I will be happy for some reasons and then in ...

शहर दिल्ली

किसी एक सवाल के जवाब के लिए हम अनजाने ही बुनने लगते हैं कई सारे नए सवाल. फिर हम खोजने लगते हैं उन नए सवालों के जवाबों को. इन सवालों के जवाबों में फिर उभर आते हैं इनमें छुपे नए सवाल. जाने हम क्या ढूंढने आए थे इतनी दूर. जाने अब क्या ढूंढना पड़ रहा है. . . . . . . . दिल्ली की सड़कों पर चलती हूं मैं , हलका बस्ता और भारी मन लिए. . . . . . . दिल्ली के रास्ते बहुत लंबे हैं, यहां की रातें जाने किस उजाले से रोशन है, यहां बारिशे बहुत कम होती है, यहां हम घूमते हैं अनचाही मुस्कान लिए, यहां हमारे शहर सा कुछ नहीं है. यहां किसी मोड़ पर चलते हुए, तुम से टकरा जाना नहीं होता. . . . . . . . दिल्ली की धुंध भरी किसी शाम में, एक फिकी मुस्कान के साथ उसने अलाव में हाथ सेकते हुए कहा, "हम शहर बदल सकते हैं, मगर अपने इन हालातों का क्या करेंगे?" . . . . . . . दिल्ली की किसी सड़क पर बैठे हुए, मैं लिख रही हूं दिल्ली के किस्से और कोई नाम है जो स्मृति में है. स्मृति जो मिट जानी चाहिए, उसके हमें मिटा देने से पहले. 

डायरी का पन्ना

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नए दुख की धूसर परत आ बैठी है पुराने दुख पर, इसके अलावा नहीं होता कुछ नया, दुख में. . . . सुकून की तलाश में घुमते हुए, जा बैठना किसी सड़क किनारे, चाँद की रोशनी में मुस्कुराना, और रोना कभी. बहुत सारा. किसी साल के हर दूसरे-तीसरे दिन का चला आ रहा क्रम. . . . . किसी प्रोफाइल में घुमते हुए एक तस्वीर दिखी है उसकी. सुकून. . . . . . उसमे और उसकी तस्वीर में कोई फर्क नहीं है, सिवा इसके की वो अब अक्सर नाराज़ रहता है. . . . रात की ट्रेन पकड़ने से पहले उसने कहा नहीं कुछ भी, मगर लगा की उसने कहा हो जाने कैसे रहोगी अब अकेले तुम.

एक स्मृति का दुख (Part-2)

"हैलो?" उस ओर से कोई आवाज नहीं आई. किआ ने दोबारा कहा -"हैलो?" उस ओर से कुछ जो़र से गिरने की आवाज़ आई और फोन कट गया. किआ ने फोन करने का प्रयास किया मगर अब वो नंबर बंद हो चुका था. किआ ने अपना बैग उठाया और घर के लिए जाने लगी. रास्ते में उसने उस फोन काॅल के बारे में सोचा. क्या वो कोई पहचान का होगा? या फिर गलती से किसी ने? मगर फोन क्यूँ नहीं लग रहा होगा? क्या फोन गिर कर बंद हुआ होगा? या किसी ने जानबुझ कर? इन्हीं सवालों के साथ बातचीत करते-करते किआ घर पहुँच गई थी. सुबह स्याह थी. रात से भी अधिक. किआ कल की बची पैकिंग के लिए सामान समेटने लगी. उसे इस जगह पर रहते एक साल भी नहीं हुआ था मगर उसका दिल आ गया था इस शहर पर. उसने सोचा की काश वो भाग सकती यहां से दूर कहीं. जहाँ सुकून होता. जहाँ उसकी परेशानीयां नहीं होती. दूर-दूर तक भी नहीं. लेकिन हम जगहों से भाग सकते हैं,  हालातों से नहीं. यहां से कहीं चले भी जाया जाए तो फिर नई जगह की नई चुनौतियां हमारा इंतज़ार कर रही होती है. हम घिरे रहते हैं इन्हीं चुनौतियों के घेरे में. जगह बदलने से इस घेरे का दायरा बढ़ जाता है मगर इस घेरे से ब...

पांचवी बात से पहले

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किसी किताब के बीच छुपा रखे थे दो आंसू उसने. और छुपा रखी थी बहुत सी बेचैनी अपने भीतर. ***** हम उम्र भर घुमते रहते हैं किसी उदासी भरे मर्तबान के आस-पास चींटी जैसे. -"सुख कहा है?" -"पता नहीं." -"क्या कोई मर्तबान होगा खुशी का? क्या हम कभी उसमें खो सकते हैं? कि वही घुमते हुए गुज़र जाए उम्र सारी?" -'' तुम्हारी इन बातों को सुन कर दुख होने लगता है मुझे......  सुनो, चलो कहीं घुम कर आते हैं.'' -''चलो.'' ***** उसने नायक से विदा लेते हुए कहा - "उस दिन का एक टुकडा़ रखा है संभाल कर मैंने. खुशी. बाकि रखे ही थे बेहिसाब दुख. जाने कब से. " ***** हम किसी बात में उलझ कर खोने लगते हैं खुद को. आहिस्ता-आहिस्ता. काश मैंने सोची होती यह बात तुम्हारी किसी भी बात को सोचने से पहले! 

एक स्मृति का दुख

थोडी़ सी बेचैनी में से चार टुकडे़ रख दिए है किनारे उसने. एक हाथ में कोल्ड कॉफी लिए और दूसरे हाथ में  एक पुराना चाबी का छल्ला लगातार चारो तरफ उंगलियों से घुमाते हुए उसने सोचा कि जाने क्या बात रही होगी उसकी उदासी के पीछे. उसके मुँह पर निराशा घर कर चुकी थी मगर वो सड़क इतनी सुनसान थी कि कोई उसकी उस निराशा को पढ़ नहीं सकता था. किआ कई देर तक ऐसे ही बैठी रही. मौन. कोल्ड कॉफी खत्म करने के बाद उसने अपने बैग से फोन निकाल कर उसे थोडी़ देर तक निहारा फिर उसे दोबारा बैग में रख दिया. एक गहरी सास ले कर उसने अपने हाथ में पकड़े छल्ले को सामने बह रहे दरिया में फेंक दिया. बारिश की गहरी स्याह शाम धीरे-धीरे उसके चारों ओर उतर आई थी. उसे देख कर लग रहा था की वह एक मृत शरीर बन  चुकी है. जिस पर हज़ार विलापो का, मन्नतों का या फिर चाहनाओं का कोई असर नहीं हो पाता. जो बस वैसा ही रह जाए. स्थिर. जिसमे कोई चेतना बची न हो. किआ वही लगी बेंच पर दो घंटों से बैठी हुई थी. बारिश की हल्की फुहारे गिरने लगी थी और थोडी़ देर बाद उसने लगभग घबराते हुए आसपास देखा जैसे वो अब तक किसी गहरी नींद में थी. इसी घबराहट में उसन...

चार सच और एक अधुरी बात

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एक महल था ताश का, एक ख्वाब था कांच का, दोनो बिखरे बैठे है, और तीसरी मैं बैठी हूँ चुप. ********** पैकिंग करते वक़्त मैनें ट्रॉली बैग की सबसे नीचे की चैन में रख ली है कुछ खुशियां छुपा कर. मगर उदासी अभी भी छलक जाती है आँखों से. *********** देर सवेर का एक ख्वाब था, तुम्हारा धुंधलाता हुआ चेहरा, तुम्हारी मिटती हुई आवाज़, और फिर स्याह अंधेरा. हर ओर. मै अक्सर ऐसे ही घबरा कर उठ जाती हूँ. *********** हल्के कत्थई रंग से सज चुकी है शाम, उसकी उदासी का रंग गहरा कर हो गया है स्याह, और फिरोजी रंग की बात निरर्थक है इस बातचीत में, हालांकि उसकी मुस्कान का रंग गुलाबी था. ********** कई दफा मन होता है, तुम से बात करने का, कि कहूँ तुम्हें, जानां! तुम्हारे पास शायद भुल आई हूँ मै. खुदको. **********

रुमानी खयाल

विरह का मौसम अंत की ओर है वसंत की पहली आहट हुई है अभी और सब ओर की जाने लगी अपने हमदर्द से मिलने की मन्नतें, गली की ओर खुलती, इक मुद्दत से बंद खिड़की को खोला गया, और गली के आखरी छोर के पेड़ के नीचे की जगह खंगाली गई, लिखी गई कुछ एक नज्में, कुछ याद किया गया उन्हें, इंद्रधनुष के रंगों से सजाई गई सब दुआएं आसमान पर, तितलियों सी ख्वाहिशें उड़ने लगी चारों ओर, रंग-बिरंगी लिबास में. बरसती फुहारों के बीच, मेरे मन के भीतर चलने लगती है तुम्हारे संग बीते लम्हों की झलक. हर मुमकिन झलक. तुम न हो तो बस यह कुछ रुमानी खयाल ही हैं, जो तुम्हारे न होते हुए भी, ज़र्रे-ज़र्रे में, तुम्हारे होने का एहसास करवाते हैं. हर आस, हर चाह, हर नज़्म मे बस-तुम ओ फरेबी! तुम्हारा शुक्रिया तुम जहाँ भी रहो, खुश रहो, जियो फकत हकीकत में, की रुमानी खयालों की संगत हर दम अच्छी नहीं होती.

वसंत विरह

"तुमने तिलिस्मी दुनिया देखी है?" हर ओर बिखरी होती है वहाँ चाँदनी, कितना तो शोर होता है, निरंतर फूटता शोर, हज़ारों चुप्पीयो के बीच से कही, मन किसी अव्वल दर्जे के जज सा, बैठ जाता है सारी फरियादे सुनने, मन ही पहुंचता है फिर फरियादे लेकर. यह वसंत विरह क्या है? प्रेम की अदालतों में दर्ज है करोड़ों से भी ज्यादा अर्जी़याँ, दुनिया के पहले छोर से आखरी छोर तक के प्रेमियों की, हर दूसरी अर्जी़ में अंकित है बस एक ही शिकायत, "तुम्हारे खत के आख़िर में लिखें सारे वादे झूठे थे जानां" कि वो जो अगली मुलाकात होनी थी, वो कब होगी? होगी या की नहीं? या की वसंत विरह सा गुज़रेगा? या की वसंत वह है जब तुम आओगे.

डियर अननोअन, ईट्स बेटर टू स्टे आउट आॅफ माई लाईफ.

एक और कोशिश है. मैने कई बार बहुत कुछ लिखा और मिटा दिया. कुछ यू की उसका होना कभी था ही नही. मुझे लगा की मै तुम्हे नही लिख सकती उतना अच्छा जितने तुम असल में हो. अतीत से एक गहरा लगाव है मुझे. वो चीज़ो जिसकी चाहना बहुत थी या की अब भी है उनके होने के निशान दर्ज़ है काली स्याही से अतीत के पन्नो में आज भी. किसी ऐकांत कि एक अबूझ खामोशी में आँखो के किनारो से छलकती है नाकामी. एक नज़र भर देखने पर होने लगता है सब सजीव. मन भींच जाता है. कितना कुछ अनकहा रह गया था तब. एक आखिरी खत भेजा था मैने, कोरा. अपने शहर से भेजी थी शहर भर की दुआएं चुराकर. हवा की हल्की आहाट होती है और दोबार आ जाता है असहनीय यथार्थ. खराबी. हर तरफ बिखरी उदासी. गुम सुकून. बेतरह ख़याल और मन मै खानाबदोशो सा बसा एक नाम. डियर अननोअन, ईट्स बेटर टू स्टे आउट आॅफ माई लाईफ.

कोरा मन

कोरा मन सबसे अच्छा होता है जिसमे नही होती कोई चिंता दुनियादारी की, जो नही जानता किसी को चाहने की फितरत, जिसका नही होता कोई ईमान, जिसे नही पता दुनिया के सलीके।जो अपनी ही मस्ती में दर बदर घुमकर करता है अल्हङ हरकते। हल्की फुहारो में भीग कर गई कैफे में अपनी पसंदीदा काॅफी दस मिनट से पी रही शांत लङकी भी दरअसल नही है शांत कि उसकी आँखे तलाशती है हर पल कैफे में आते लोगो में किसी का चेहरा। असल में नही होता कोई मन खाली क्युकी ईश्वर ही है इस कला में माहिर और इंसान नही हो सकता है ईश्वर। 

अंत से पहले

एक दिन सारी मुश्किले, सारे दुख खत्म होगें। जिसकी कदर ना कि जायेगी वो भी एक दिन सब को अलविदा कह कर मिलेगा अपने असली रचियता से। शेष रहेंगी बस यादे। मन बार बार तङपने लगता है कि ये सब ओर इतना अहं, दिखावा, ज़हरीलापन, लालच क्यो है।